Thursday, March 24, 2016

Proximal to the tree house

गृहके समीपस्थ वृक्ष
 
1) अशोक, पुन्नाग, मौलसिरी, शमी, चम्पा, अर्जुन, कटहल, केतकी, चमेली, पाटल, नारियल, नागकेशर, अड़हुल, महुआ, वट, सेमल, बकुल, शाल आदि वृक्ष घरके पास शुभ हैं ।
पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा, पीपल, कपित्थ, अगस्त्य, बेर, निर्गुण्डी, इमली, कदम्ब, केला, नींबू, अनार, खजूर, बेल आदि वृक्ष घरके पास अशुभ हैं ।


2) कई वृक्ष ऐसे हैं, जो दिशाविशेषमें स्थित होनेपर शुभ अथवा अशुभ फल देनेवाले हो जाते हैं, जैसे -
पूर्वमें पीपल भय तथा निर्धनता देता है । परन्तु बरगद कामना-पूर्ती करता है ।
आग्नेयमें वट, पीपल, सेमल, पाकर तथा गूलर पी़ड़ा और मृत्यु देनेवाले हैं । परन्तु अनार शुभ है ।
दक्षिणमें पाकर रोग तथा पराजय देनेवाला है, और आम, कैथ, अगस्त्य तथा निर्गुण्डी धननाश करनेवाले हैं । परन्तु गूलर शुभ है ।
नैर्ऋत्यमें इमली शुभ है ।
दक्षिण-नैर्ऋत्यमें जामुन और कदम्ब शुभ हैं ।
पश्चिममें वट होनेसे राजपीड़ा, स्त्रीनाश व कुलनाश होता है, और आम, कैथ अगस्त् तथा निर्गुण्डी धननाशक हैं । परन्तु पीपल शुभदायक है ।
वायव्यमें बेल शुभदायक है ।
ईशानमें आँवला शुभदायक है ।
ईशान-पूर्वमें कटहल एवं आम शुभदायक हैं ।


3) घरके पास कॉंटेवाले, दूधवाले तथा फलवाले वृक्ष स्त्री और सन्तानकी हानि करनेवाले हैं । यदि इन्हें काटा न जा सके तो इनके पास शुभ वृक्ष लगा दें ।
कॉंटेवाले वृक्ष शत्रुसे भय देनेवाले, दूधवाले वृक्ष धनका नाश करनेवाले और फलवाले वृक्ष सन्तानका नाश करनेवाले हैं । इनकी लकड़ी भी घरमें नही लगानी चाहिये ।
 

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Wednesday, March 23, 2016

Home building materials

गृह निर्माणकी सामग्री
 
1) ईंट, लोहा, पत्थर, मिट्टी और लकड़ी - ये नये मकानमें नये ही लगाने चाहिये ।

2) नये मकानमें पुरानी लकड़ी नहीं लगानी चाहिये । एक मकानमें उपयोग की गयी लकड़ी दूसरे मकानमें लगानेसे सम्पत्तिका नाश एवं अशान्तिकी प्राप्ति होती है । ऐसे मकानमें गृहस्वामी रह नहीं पाता, यदि रहता है तो उसकी मृत्यु होती है ।


3) मकानमें एक, दो या तीन जातिकी लकड़ी लगानी चाहिये । एक जातिकी लकड़ी उत्तम, दो जातिकी मध्यम और तीन जातिकी अधम होती है ।

4) एक, दो या तीन प्रकारके काष्ठोंसे बनाया घर शुभ होता है । इससे अधिक प्रकारके काष्ठोंसे बनाया घर अनेक भय देनेवाला होता है ।

5) नया द्वार पुराने द्वारसे संयुक्त होनेपर दूसरे स्वामीकी इच्छा करता है । नया द्रव्य पुराने द्रव्यसे संयुक्त होनेपर कलिकारक (कलह करानेवाला) होता है । मिश्रजातिके द्रव्यसे निर्मित द्वार या घर अशुभ होता है ।
एक वास्तुसे निकाला गया द्रव्य दूसरे वास्तुमें प्रयुक्त नहीं करना चाहिये । ऐसा करनेपर देवमन्दिरमें पूजा नहीं होती और गृहमें गृहस्वामी नहीं बस पाता ।
देव-दग्ध (अग्निसे जले) द्रव्यसे जो भवन बनाया जाता है, उसमें गृहस्वामी निवास नहीं कर पाता और यदि निवास करता है तो नाशको प्राप्त होता है ।

6) त्याज्य वृक्ष - दूधवाले, कॉंटेवाले, पुष्पोंवाले, रस बहानेवाले, पक्षियोंके घोंसलेवाले, उल्लुओंके वास, मांसाहारी पक्षियोंसे दूषित, मधुमक्खियोंके छत्तेसे युक्त, सर्पके वास, चींटियोंसे आच्छादित, मकड़ीके जालोंसे ढके, भूत-प्रेतोंके वास, दीमक लगे हुए, गॉंठोंसे युक्त, कोटरवाले, गड्ढेसे ढके हुए, रोगोंसे युक्त, जिनका आधा भाग सूख गया हो या टूट गया हो, एक-दो शाखावाले, बिजली और आँधीसे गिरे हुए, जले हुए, हाथी आदि जानवरोंसे रौंदे हुए, समाधि-स्थलमें लगे हुए, देवमन्दिरमें लगे हुए, आश्रममें लगे हुए, नदियोंके संगमपर स्थित श्मशानभूमिमें लगे हुए, जलाशय (तालाब आदि) - पर लगे हुए, खेतमें लगे हुए, चौराहे, तिराहे या मार्गपर लगे हुए - इन वृक्षोंकी लकड़ी गृहनिर्माणके काममें नहीं लेनी चाहिये ।

7) पीपल, कदम्ब, नीम, बहेड़ा, आम, पाकर, गूलर, सेहुड़, वट, रीठा, लिसोड़ा, कैथ, इमली, सहिजन, ताल, शिरीष, कोविदार, बबूल और सेमल - इन
वृक्षोंकी लकड़ी अशुभ फल देनेवाली है ।

8) ग्राह्य वृक्ष - अशोक, महुआ, साखू, असना, चन्दन, देवदारू, शीशम, श्रीपर्णी, तिन्दुकी, कटहल, खदिर, अर्जुन, शाल और शमी - इन वृक्षोंकी लकड़ी शुभ फल देनेवाली है ।

9) धनदायक शीशम, श्रीपर्णी तथा तिन्दुकीके काष्ठको अकेले ही लगायें । अन्य किसी काष्ठके साथ सम्मिलित करनेपर ये मंगलकारी नहीं होते । इसी तरह धव, कटहल, चीड़, अर्जुन, पद्म वृक्ष भी अन्य काष्ठोंके साथ सम्मिलित होनेपर गृहकार्यके लिये शुभदायक नहीं होते ।

10) शहतीर, चौखट, दरवाजे - खिड़कियॉं, खूँटी, फर्नीचर आदिके निर्माणमें निषिद्ध वृक्षोंकी लकड़ी काममें नहीं लेनी चाहिये ।

11) शय्या के निर्माणमें श्रीपर्णी धनदायक, आसन रोगनाशक, शीशम वृद्धिकारक, सागवान कल्याणकारक, पद्मक आयुप्रद, चन्दन शत्रुनाशक एवं सुखदायक और शिरीष श्रेष्ठ है ।

12) काष्ठको कृष्णपक्षमें काटना चाहिये । शुक्लपक्षमें नही काटना चाहिये ।

13) जिस वृक्षको काटना हो, उसके निमित्त रातमें पूजा और बलि देकर प्रात: ईशानकोणसे प्रदक्षिणा-क्रमसे उसको काटे । यदि वृक्ष कटकर पूर्व, उत्तर या ईशानमें गिरे तो शुभ है, अन्य दिशामें गिरे तो अशुभ है ।

14) वृक्ष कटनेपर यदि पूर्व दिशामें गिरे तो धन-धान्यकी वृद्धि होती है । आग्नेयमें गिरे तो अग्निभय, दक्षिणमें गिरे तो मृत्यु, नैर्ऋत्यमें गिरे तो कलह, पश्चिममें गिरे तो पशुवृद्धि, वायव्यमें गिरे तो चोर-भय, उत्तरमें गिरे तो धनकी प्राप्ति और ईशानमें गिरे तो अतिश्रेष्ठ फल प्राप्त होता है ।

15) पत्थरका प्रयोग - वर्तमानमें घरोंमें पत्थरका प्रयोग अधिक किया जाने लगा है, परंतु वास्तुशास्त्रमें इसका प्रयोग निषिद्ध है ।

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Vastu Tips To Avoid Illness In Home